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दादा जी की सीख - बाहर हम बोलबई ना, घर मा छोड़बई ना

  🐍✨ "डर भी ज़रूरी है, मगर हद से ज़्यादा नहीं" — मेरे दादा जी की बातों से सीखा "बाहर हम बोलबई ना, और घर मा हम छोड़बई ना!" — ये कहावत मैंने अपने दादा जी से सुनी, और इस एक लाइन ने मुझे ज़िन्दगी का एक बड़ा सबक सिखा दिया। हमारे गाँव में साँप देखना कोई नई बात नहीं। पर दादा जी का नज़रिया हमेशा अलग रहा — वो कहते थे कि अगर साँप खेत में या जंगल में मिले, तो रास्ता छोड़ दो , क्योंकि वो अपने घर में है। लेकिन अगर वो घर में घुस आए , तो फिर उसे रोका जाएगा — क्योंकि अब वो हमारी सीमा में आया है। 🌾 यह केवल साँपों की बात नहीं... यह तो एक गहरी सोच है — कि प्रकृति से बैर नहीं , सीमाओं की रक्षा ज़रूरी है। 🧠 एक और सीख — "साँप मारो तो उसका मुँह कुचल दो" जब मैंने दादा जी से इसका मतलब पूछा, तो उन्होंने न सिर्फ़ कहा, बल्कि समझाया भी — कि ज़हरीली चीज़ का जड़ से खात्मा करना ज़रूरी है , क्योंकि अधूरा छोड़ा गया ज़हर, वापसी का रास्ता ढूंढ़ लेता है। 🤯 पर सबसे दिलचस्प थी यह बात: "साँप की आँखें कैमरे जैसी होती हैं — वो बदला लेने आता है!" मैंने यह बात स...